अलबर्ट आइंस्टीन की जीवनी । Biography of Albert Einstein in Hindi

अलबर्ट आइंस्टीन की जीवनी । Biography of Albert Einstein in Hindi

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अलबर्ट आइंस्टीन की जीवनी । Biography of Albert Einstein in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. अलबर्ट का बाल्यकाल और शिक्षा ।

3. अलबर्ट आइंस्टीन और सापेक्षता का सिद्धान्त ।

4. अलबर्ट की अभिरुचियां ।

6. अलबर्ट की अन्य खोजें और उपलब्धियां ।

7. उपसंहार ।

समय की सत्ता एवं सापेक्षता के प्रश्न को वैज्ञानिक आधार देने वाले प्रकाश वैद्युत प्रभाव की तार्किक व्याख्या एवं उसके खोजकर्ता महान् परमाणु वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन विज्ञान जगत की महान् विभूतियों में से एक थे ।

2. अलबर्ट का बाल्यकाल और शिक्षा:

इस महान् परमाणु वैज्ञानिक का जन्म 14 मार्च, 1879 को दक्षिणी जर्मनी के उल्म शहर गे एक यहूदी परिवार में हुआ था । उनके पिता हरमैन आइंस्टीन एक स्वतन्त्र विचारों वाले स्वतन्त्र व्यक्ति थे । वे धर्म तथा विचारों में तनिक भी विश्वास नहीं रखते थे । उनकी माताजी कलात्मक अभिरुचि वाली महिला थीं ।

बालक अलबर्ट का बचपन एक साधारण बालक की तरह था । कहा जाता है कि उन्होंने बोलना बहुत देरी से सीखा था । बालक अलबर्ट की शिक्षा का प्रारम्भ म्यूनिख के एक कैथोलिक रकूल में हुआ था । स्कूल की पढ़ाई में बालक आइंस्टीन का मन नहीं लगता था । वे स्कूल की पढ़ाई छोड़कर प्राकृतिक वातावरण में चले जाते ।

अपने चाचा जेक द्वारा दी गयी गणित की प्रारम्भिक शिक्षा और मां के द्वारा पैदा किया गया वायलिन का शौक उनकी धरोहर था । जर्मनी के जिमनेजियम सेकण्डरी स्कूल में प्रवेश लेने के बाद वहां की रूढ़िवादी शिक्षा से उन्हें जल्द ही बोरियत महसूस होने लगी । वहां उतने योग्य, विद्वान् शिक्षक नहीं थे, जो अलबर्ट के प्रश्नों का सही-सही जवाब दे सकें ।

 

एक शिक्षक ने तो उन्हें सबके सामने सवाल पूछने पर डांटते हुए यह कहा कि ”हमसे ऐसे प्रश्न मत पूछो, जिसका उत्तर हमें नहीं मालूम ।” एकान्तप्रिय अलबर्ट को सब असामाजिक कहा करते थे । वे उन बातों को दिमाग में नहीं रखना चाहते थे, जो आवश्यकता पड़ने पर किताबों से मिल जाती थीं ।

अलबर्ट के पिता ने आर्थिक तंगी के कारण म्यूनिख में अपने मित्र के यहां पढ़ाई करने के लिए छोड़ दिया और वे सपरिवार इटली चले गये । इधर म्यूनिख में अलबर्ट को स्कूल के साथी व शिक्षक पसन्द नहीं करते थे । उन्हें जिमनेजियम स्कूल से भी निकाल दिया गया । वे परिवार में पुन: शान्ति से रहने लगे ।

इटली की पहाड़ियों में जाकर एकान्त में चिन्तन किया करते । उन्होंने भौतिक विज्ञान का बीजगणितीय निरुपण पड़ा, साथ ही इम्मैन्यू कैंट रचित पुस्तक ”क्रिटिक ऑफ प्योर रिजन” जैसी पुस्तकें पड़ी, जो सामान्य बुद्धि वालों की पहुंच से बाहर थीं ।

विश्व प्रसिद्ध स्वीजरलैण्ड के ज्यूरिख पॉलिटेकनिक स्कूल में उन्हें इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र में कमजोर होने की वजह से प्रवेश नहीं मिला । आराऊ के पॉलिटेकनिक सेंकड्री  स्कूल का वातावरण उनके शोधपरक बुद्धि के लिए उपयुक्त था । आर्थिक तंगी में ट्‌यूशन तथा लेखन से कुछ कमाई कर लेते थे ।

सन् 1900 में ज्यूरिक पॉलिटेकनिक स्वाऊल से भौतिकी में रनातक की उपाधि विशिष्ट श्रेणी में उत्तीर्ण की फिर भी टीचर पद के लिए अयोग्य समझा गया । बर्न के पेटेंट कार्यालय में नौकरी करने के लिए विवश होना पड़ा ।

यहां वेतन काफी अच्छा तथा समय भी अच्छा मिलता था । वैज्ञानिक चिन्तन के लिए यह नौकरी अच्छी थी । उस समय प्रकाशकीय व्यतीकरण, विवर्तन की व्याख्या के लिए तरंग सिद्धान्त, भारहीनता, अविरता, प्रत्यास्थता आदि के गुण काल्पनिक माध्यम इधर और यान्त्रिकी के सभी नियम इसके सापेक्ष मान लिये गये थे, किन्तु उसकी सैद्धान्तिक व्याख्या ठीक नहीं थी ।

न्यूटन तथा गैलिलियो के गति के नियम चाल पर ठीक थे, किन्तु प्रकाश वेग पर खरे नहीं उतरते थे । हेनरी बेक्चरील एवं क्यूरी दम्पत्ति द्वारा खोजे गये रेडियोधर्मिता की व्याख्या भी ठीक नहीं थी । यूरेनियम, रेडियम एवं थोरियम जैसे तत्त्व अधिक मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन कर रहे हैं ।

किशोर मन से आइंस्टीन के मन में उठे सवाल यह प्रश्न उठाते थे कि यदि कोई व्यक्ति प्रकाश के वेग से 1 लाख 86 हजार मील से उसके साथ उसकी दिशा में चल सके, तो प्रकाश की किरणें उसे स्थिर प्रतीत होंगी ।

2. अलबर्ट का बाल्यकाल और शिक्षा:

इस महान् परमाणु वैज्ञानिक का जन्म 14 मार्च, 1879 को दक्षिणी जर्मनी के उल्म शहर गे एक यहूदी परिवार में हुआ था । उनके पिता हरमैन आइंस्टीन एक स्वतन्त्र विचारों वाले स्वतन्त्र व्यक्ति थे । वे धर्म तथा विचारों में तनिक भी विश्वास नहीं रखते थे । उनकी माताजी कलात्मक अभिरुचि वाली महिला थीं ।

बालक अलबर्ट का बचपन एक साधारण बालक की तरह था । कहा जाता है कि उन्होंने बोलना बहुत देरी से सीखा था । बालक अलबर्ट की शिक्षा का प्रारम्भ म्यूनिख के एक कैथोलिक रकूल में हुआ था । स्कूल की पढ़ाई में बालक आइंस्टीन का मन नहीं लगता था । वे स्कूल की पढ़ाई छोड़कर प्राकृतिक वातावरण में चले जाते ।

अपने चाचा जेक द्वारा दी गयी गणित की प्रारम्भिक शिक्षा और मां के द्वारा पैदा किया गया वायलिन का शौक उनकी धरोहर था । जर्मनी के जिमनेजियम सेकण्डरी स्कूल में प्रवेश लेने के बाद वहां की रूढ़िवादी शिक्षा से उन्हें जल्द ही बोरियत महसूस होने लगी । वहां उतने योग्य, विद्वान् शिक्षक नहीं थे, जो अलबर्ट के प्रश्नों का सही-सही जवाब दे सकें ।

एक शिक्षक ने तो उन्हें सबके सामने सवाल पूछने पर डांटते हुए यह कहा कि ”हमसे ऐसे प्रश्न मत पूछो, जिसका उत्तर हमें नहीं मालूम ।” एकान्तप्रिय अलबर्ट को सब असामाजिक कहा करते थे । वे उन बातों को दिमाग में नहीं रखना चाहते थे, जो आवश्यकता पड़ने पर किताबों से मिल जाती थीं ।

अलबर्ट के पिता ने आर्थिक तंगी के कारण म्यूनिख में अपने मित्र के यहां पढ़ाई करने के लिए छोड़ दिया और वे सपरिवार इटली चले गये । इधर म्यूनिख में अलबर्ट को स्कूल के साथी व शिक्षक पसन्द नहीं करते थे । उन्हें जिमनेजियम स्कूल से भी निकाल दिया गया । वे परिवार में पुन: शान्ति से रहने लगे ।

इटली की पहाड़ियों में जाकर एकान्त में चिन्तन किया करते । उन्होंने भौतिक विज्ञान का बीजगणितीय निरुपण पड़ा, साथ ही इम्मैन्यू कैंट रचित पुस्तक ”क्रिटिक ऑफ प्योर रिजन” जैसी पुस्तकें पड़ी, जो सामान्य बुद्धि वालों की पहुंच से बाहर थीं ।

विश्व प्रसिद्ध स्वीजरलैण्ड के ज्यूरिख पॉलिटेकनिक स्कूल में उन्हें इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र में कमजोर होने की वजह से प्रवेश नहीं मिला । आराऊ के पॉलिटेकनिक सेंकड्री  स्कूल का वातावरण उनके शोधपरक बुद्धि के लिए उपयुक्त था । आर्थिक तंगी में ट्‌यूशन तथा लेखन से कुछ कमाई कर लेते थे ।

सन् 1900 में ज्यूरिक पॉलिटेकनिक स्वाऊल से भौतिकी में रनातक की उपाधि विशिष्ट श्रेणी में उत्तीर्ण की फिर भी टीचर पद के लिए अयोग्य समझा गया । बर्न के पेटेंट कार्यालय में नौकरी करने के लिए विवश होना पड़ा ।

यहां वेतन काफी अच्छा तथा समय भी अच्छा मिलता था । वैज्ञानिक चिन्तन के लिए यह नौकरी अच्छी थी । उस समय प्रकाशकीय व्यतीकरण, विवर्तन की व्याख्या के लिए तरंग सिद्धान्त, भारहीनता, अविरता, प्रत्यास्थता आदि के गुण काल्पनिक माध्यम इधर और यान्त्रिकी के सभी नियम इसके सापेक्ष मान लिये गये थे, किन्तु उसकी सैद्धान्तिक व्याख्या ठीक नहीं थी ।

न्यूटन तथा गैलिलियो के गति के नियम चाल पर ठीक थे, किन्तु प्रकाश वेग पर खरे नहीं उतरते थे । हेनरी बेक्चरील एवं क्यूरी दम्पत्ति द्वारा खोजे गये रेडियोधर्मिता की व्याख्या भी ठीक नहीं थी । यूरेनियम, रेडियम एवं थोरियम जैसे तत्त्व अधिक मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन कर रहे हैं ।

किशोर मन से आइंस्टीन के मन में उठे सवाल यह प्रश्न उठाते थे कि यदि कोई व्यक्ति प्रकाश के वेग से 1 लाख 86 हजार मील से उसके साथ उसकी दिशा में चल सके, तो प्रकाश की किरणें उसे स्थिर प्रतीत होंगी ।

3. अलबर्ट आइंस्टीन और सापेक्षता का सिद्धान्त:

सन् 1905 में आइंस्टीन ने सापेक्षता के सिद्धान्त का प्रतिपादन कराते हुए यह बोध कराया:

  1.  समस्त गति शुद्ध रूप से सापेक्ष होती है । इस निरन्तर गतिशील ब्रह्माण्ड में किसी समय कोई बिन्दु नियत नहीं है, जिससे घटनाओं का मापन निरपेक्ष हो ।
  2.  अन्तरिक्ष में प्रकाश का वेग नियत होता है । वह प्रकाश के उदगम श्रोत से स्वतन्त्र होता है ।
  3.  समगति से घूमते हुए समस्त क्रमों के लिए प्रकृति के नियम एक ही हैं ।
  4.  यह विश्व त्रिवमीय नहीं, बल्कि लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई की तीन परिचित विमायों के अतिरिक्त चौथी विमा समय से निर्मित है ।

आइंस्टीन ने कहा था: किसी व्यक्ति विशेष के अनुगव हमें घटनाओं के क्रम की व्यवस्था प्रतीत होते हैं । इस क्रम में हम जिस अलग घटना का ध्यान करते हैं, वह पहले और बाद के पदों में व्यवस्थित होती है । अत: उस व्यक्ति विशेष के लिए एक वैयक्तिक समय का अस्तित्व है ।

यह स्वयं नापा नहीं जा सकता । मैं वास्तव में संख्याओं का, घटनाओं का ऐसा सम्बन्ध स्थापित कर सकता हूं कि अधिक संख्या बाद वाली संख्या से कम संख्या पहले वाली घटना से सम्बन्धित हो । इस प्रकार हम सूर्योदय को 6 और मध्याह को 12 संख्या से सूचित करें, तो निश्चित कर सकते हैं कि मध्याह सूर्योदय के बाद होता है ।

लेकिन हमें किसी घड़ी के बिना एक अंधेरे कमरे में बन्द कर दिया जाये, तो इन सब बातों का हमें कोई संकेत अनुभव नहीं हो सकता और इस तरह अपने शरीर की आवश्यकताओं के अतिरिक्त हमें पहले और बाद आदि का ज्ञान नहीं होता ।

सापेक्षता के सिद्धान्त के अनुसार प्रकाश का वेग अचल होने के कारण अन्य राशियों, जैसे-समय, नाप, द्रव्यमान आदि में परिवर्तन होता है । द्रव्यमान पर वस्तु के वेग के पड़ने वाले प्रभावों को आइंस्टीन ने सूत्र द्वारा दर्शाया है ।

जहां वस्तु का विराम, द्रव्यमान का वेग तथा वेग पर वस्तु का द्रव्यमान है । यदि आलू के द्रव्यमान की वस्तु भी प्रकाश से चल पाये, तो उसका द्रव्यमान कई टन हो जायेगा । इस सूत्र को रखने पर, अर्थात यदि वस्तु का वेग प्रकाश के वेग के बराबर हो, तो द्रव्यमान अनन्त हो जायेगा, जो कि असम्भव है, आइंस्टीन ने कहा है कि कोई वस्तु प्रकाश वेग के बराबर नहीं चल सकती है ।

इस सिद्धान्त के अनुसार यदि किसी वस्तु का वेग प्रकाश के वेग से 9/10 हो, तो उस वस्तु की लम्बाई गति की दिशा में आधी रह जाती है और कोई पिण्ड प्रकाश के वेग का 9/10 हो, तो उस वस्तु की लम्बाई गति की दिशा में आधी रह जाती है और यदि कोई पिण्ड प्रकाश के वेग के बराबर चल सके, तो उसके लिए समय ठहर जाता है ।

अपने इस कथन को स्पष्ट करने के आइंस्टीन ने एक उदाहरण दिया, जो जुड़वां बच्चों का विरोधाभास या ट्‌वीन पैराडाक्स के नाम से विख्यात है । इसमें उन जुड़वां भाइयों की कल्पना की गयी, जिनमें से एक पैदा होने के बाद पृथ्वी पर रह गया, जबकि पैदा होने के ही दिन {जबकि उसकी आयु एक दिन थी} प्रकाश के वेग से गतिशील यान में रख दिया गया ।

100 वर्षो बाद जब वह यान पृथ्वी पर लौटा तो यान में सवार भाई की उस मात्र एक दिन थी और पृथ्वी पर उसका जुड़वां भाई 100 वर्ष का वृद्ध हो चुका था । वह अपने नाती-पोतों से घिरा हुआ था । समय की सापेक्षता के सिद्धान्त को रोचक ढंग से समझाते हुए  आइंस्टीन ने कहा था कि यदि एक मनुष्य किसी सुन्दर लड़की के साथ 1 घण्टे तक बैठा रहे, तो उसे लगेगा कि अभी 1 मिनट ही हुआ है ।

यदि उसी मनुष्य को गरम स्टोव पर बैठा दिया जाये, तो उसे लगेगा कि 1 घण्टा हो गया । यही सापेक्षता है । वास्तव में, समय व्यक्ति की अपनी प्रकृति मात्र है । व्यक्ति अथवा उसका अनुभव करने वाला पात्र यदि बदल दिया जाये, तो उसकी अनुभूति भी बदल जाती है ।

उदाहणार्थ, मनुष्य अपनी औसत आयु 70 में बचपन, जवानी, बुढ़ापा आदि के अनुभवों से गुजरता है । इन्हीं अनुभवों से गुजरने के लिए किसी कछुए को 200 वर्षो की आवश्यकता होती है । यही अनुभव 24 घण्टे में अपनी इहलीला पूरी करके मच्छर भी प्राप्त कर लेता है । इसी तरह मनुष्य के 70 वर्ष, कछुए के 200 वर्ष और मच्छर के 24 घण्टे सभी एक बराबर हैं ।

यही कारण है कि सुख का समय हमें छोटा लगता है, जबकि दुःख का समय भारी लगता है । हर पल निमिष, सैकण्ड, घण्टे, दिन आदि का विभाजन सुविधा के लिए है । सैकण्ड को हमने छोटा मात्रक माना है । यदि हमने सैकण्ड को परिभाषित करने का दूसरा तरीका सोचा होता, तो सैकण्ड की अवधि कुछ और होती ।

यदि किसी दिन के सूर्योदय को और उसके बाद वाले सूर्योदय की अवधि को 24 घण्टे माना जाता है, तो उसका 24वां भाग 1 घण्टा गाना जाता है । 1 घण्टे को 3600 हिस्सों में विभक्त कर दें, तो उसका अस्तित्व क्या है ? दिन-रात 20,25,30 घण्टे कुछ भी हो सकते हैं ।

समय की गणना भारतीय पद्धति में एक घड़ी और एक घण्टा ढाई घड़ी के बराबर मानकर सात इकाइयों में प्रचलित है । ब्रह्मा का एक दिन मनुष्य के एक हजार दिन के बराबर होता है । इस तरह काल या समय अनन्त है, असीम है । आइंस्टीन के इसी सिद्धान्त ने परमाणु ऊर्जा को जन्म दिया । वे मानते थे कि पदार्थ का रूप परिवर्तित होता रहता है । वह नष्ट नहीं होता । यही ऊर्जा के बारे में भी है ।

4. अलबर्ट की अभिरुचियां:

आइंस्टीन की अभिरुचि वायलिन बजाने में बहुत थी । अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने जब उन्हें बम बनाने के लिए प्रेरित किया, तो वे हीरोशिमा और नागासाकी में उसके विध्वंसक रूप को देखकर दुखी हो गये ।

उनका रहन-सहन बहुत सीधा-सरल था । अपने घर की नौकरानी, माली, नाई आदि से भी आत्मीयता का अनुभव करते थे । वे ऋषियों की तरह एकाग्र, सक्रिय, ऊर्जावान और सृजनशील व्यक्ति थे ।

5. अलबर्ट की अन्य खोजें और उपलब्धियां:

बहुमुखी प्रतिभा के धनी आइंस्टीन ने मैट्रिक टेंसर, रीमान टेंसर, रिक्की आइटेन्टीस तथा गुरुत्वाष्कर्षण की भी खोज की । ब्रह्माण्डीय समस्याओं को समझने में सापेक्षता सिद्धान्त में उन्होंने जो दो परिकल्पनाएं प्रस्तुत कीं, उनमें पहली यह कि ब्रह्माण्ड बेलनाकार है और इसमें सभी आकाशगंगाएं तथा नीहारिकाएं समाई हैं ।

दूसरी यह कि ब्रह्माण्ड गोलाकार है । यह लगातार फैलता जा रहा है । आकाशगंगा हमसे तीव्र गति से दूर जा रही है । आइंस्टीन ने सबसे सुन्दर वस्तु को अनुभव का विषय बताते हुए इसे कला और विज्ञान का स्तोत्र बताया । उन्होंने परमात्मा को सूक्ष्म कहा ।

आइंस्टीन को अपने जीवन में बहुत-से अन्तर्विरोधों का सामना करना पड़ा । जर्मनी में उन्हें बार-बार अपमानित होना पड़ा । नाजियों ने बर्लिन स्थित उनके मकान को तहस-नहस कर दिया । उनकी सैर करने वाली नौका भी जज्ञ कर ली ।

वे जर्मनी में ही रहना चाहते थे । अशान्ति की अवस्था में वे असमय बूढ़े हो गये । पत्नी से तलाक के बाद वे अपने दूर की चचेरी बहिन एल्सा के साथ रहने लगे । आइंस्टीन विश्व शान्ति के लिए जीवन-भर व्याकुल रहे ।

6. उपसंहार:

आइंस्टीन का समय सापेक्षता का यह सिद्धान्त आज टेलीविजन, फोटोइलेक्ट्रिक सेल व अन्य आविष्कारों के लिए भी प्रेरणादायक सिद्ध हुआ । परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उनकी महान् खोजें अनूठी और प्रामाणिक धरोहर हैं ।

मानव-कल्याण के प्रति समर्पित आइंस्टीन को जब 1952 में इजराइल के राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव आया, तो उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया । किसी प्रकार की लालसा उनके मन में नहीं थी । ”युद्ध क्यों हो ?” ”विश्व के निर्माता” जैसे विषयों पर उन्होंने पुस्तकें भी लिखीं ।

जीवन के अन्त तक वैज्ञानिक प्रयोगों में रहने वाले  आइंस्टीन ने परमाणु निःशस्त्रीकरण के लिए ईमानदार कोशिश की । वे परमाणु ऊर्जा का विश्वशान्ति के लिए प्रयोग पर बल देते रहे । 18 अप्रैल, 1955 को इस महानू वैज्ञानिक ने प्रिस्टन के अस्पताल में इस संसार को अलविदा कहा ।

सन् 1905 में आइंस्टीन ने सापेक्षता के सिद्धान्त का प्रतिपादन कराते हुए यह बोध कराया:

1. समस्त गति शुद्ध रूप से सापेक्ष होती है । इस निरन्तर गतिशील ब्रह्माण्ड में किसी समय कोई बिन्दु नियत नहीं है, जिससे घटनाओं का मापन निरपेक्ष हो ।

2. अन्तरिक्ष में प्रकाश का वेग नियत होता है । वह प्रकाश के उदगम श्रोत से स्वतन्त्र होता है ।

3. समगति से घूमते हुए समस्त क्रमों के लिए प्रकृति के नियम एक ही हैं ।

4. यह विश्व त्रिवमीय नहीं, बल्कि लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई की तीन परिचित विमायों के अतिरिक्त चौथी विमा समय से निर्मित है ।

आइंस्टीन ने कहा था: किसी व्यक्ति विशेष के अनुगव हमें घटनाओं के क्रम की व्यवस्था प्रतीत होते हैं । इस क्रम में हम जिस अलग घटना का ध्यान करते हैं, वह पहले और बाद के पदों में व्यवस्थित होती है । अत: उस व्यक्ति विशेष के लिए एक वैयक्तिक समय का अस्तित्व है ।

यह स्वयं नापा नहीं जा सकता । मैं वास्तव में संख्याओं का, घटनाओं का ऐसा सम्बन्ध स्थापित कर सकता हूं कि अधिक संख्या बाद वाली संख्या से कम संख्या पहले वाली घटना से सम्बन्धित हो । इस प्रकार हम सूर्योदय को 6 और मध्याह को 12 संख्या से सूचित करें, तो निश्चित कर सकते हैं कि मध्याह सूर्योदय के बाद होता है ।

लेकिन हमें किसी घड़ी के बिना एक अंधेरे कमरे में बन्द कर दिया जाये, तो इन सब बातों का हमें कोई संकेत अनुभव नहीं हो सकता और इस तरह अपने शरीर की आवश्यकताओं के अतिरिक्त हमें पहले और बाद आदि का ज्ञान नहीं होता ।

सापेक्षता के सिद्धान्त के अनुसार प्रकाश का वेग अचल होने के कारण अन्य राशियों, जैसे-समय, नाप, द्रव्यमान आदि में परिवर्तन होता है । द्रव्यमान पर वस्तु के वेग के पड़ने वाले प्रभावों को आइंस्टीन ने सूत्र द्वारा दर्शाया है ।

जहां वस्तु का विराम, द्रव्यमान का वेग तथा वेग पर वस्तु का द्रव्यमान है । यदि आलू के द्रव्यमान की वस्तु भी प्रकाश से चल पाये, तो उसका द्रव्यमान कई टन हो जायेगा । इस सूत्र को रखने पर, अर्थात यदि वस्तु का वेग प्रकाश के वेग के बराबर हो, तो द्रव्यमान अनन्त हो जायेगा, जो कि असम्भव है, आइंस्टीन ने कहा है कि कोई वस्तु प्रकाश वेग के बराबर नहीं चल सकती है ।

इस सिद्धान्त के अनुसार यदि किसी वस्तु का वेग प्रकाश के वेग से 9/10 हो, तो उस वस्तु की लम्बाई गति की दिशा में आधी रह जाती है और कोई पिण्ड प्रकाश के वेग का 9/10 हो, तो उस वस्तु की लम्बाई गति की दिशा में आधी रह जाती है और यदि कोई पिण्ड प्रकाश के वेग के बराबर चल सके, तो उसके लिए समय ठहर जाता है ।

अपने इस कथन को स्पष्ट करने के आइंस्टीन ने एक उदाहरण दिया, जो जुड़वां बच्चों का विरोधाभास या ट्‌वीन पैराडाक्स के नाम से विख्यात है । इसमें उन जुड़वां भाइयों की कल्पना की गयी, जिनमें से एक पैदा होने के बाद पृथ्वी पर रह गया, जबकि पैदा होने के ही दिन {जबकि उसकी आयु एक दिन थी} प्रकाश के वेग से गतिशील यान में रख दिया गया ।

100 वर्षो बाद जब वह यान पृथ्वी पर लौटा तो यान में सवार भाई की उस मात्र एक दिन थी और पृथ्वी पर उसका जुड़वां भाई 100 वर्ष का वृद्ध हो चुका था । वह अपने नाती-पोतों से घिरा हुआ था । समय की सापेक्षता के सिद्धान्त को रोचक ढंग से समझाते हुए  आइंस्टीन ने कहा था कि यदि एक मनुष्य किसी सुन्दर लड़की के साथ 1 घण्टे तक बैठा रहे, तो उसे लगेगा कि अभी 1 मिनट ही हुआ है ।

यदि उसी मनुष्य को गरम स्टोव पर बैठा दिया जाये, तो उसे लगेगा कि 1 घण्टा हो गया । यही सापेक्षता है । वास्तव में, समय व्यक्ति की अपनी प्रकृति मात्र है । व्यक्ति अथवा उसका अनुभव करने वाला पात्र यदि बदल दिया जाये, तो उसकी अनुभूति भी बदल जाती है ।

उदाहणार्थ, मनुष्य अपनी औसत आयु 70 में बचपन, जवानी, बुढ़ापा आदि के अनुभवों से गुजरता है । इन्हीं अनुभवों से गुजरने के लिए किसी कछुए को 200 वर्षो की आवश्यकता होती है । यही अनुभव 24 घण्टे में अपनी इहलीला पूरी करके मच्छर भी प्राप्त कर लेता है । इसी तरह मनुष्य के 70 वर्ष, कछुए के 200 वर्ष और मच्छर के 24 घण्टे सभी एक बराबर हैं ।

यही कारण है कि सुख का समय हमें छोटा लगता है, जबकि दुःख का समय भारी लगता है । हर पल निमिष, सैकण्ड, घण्टे, दिन आदि का विभाजन सुविधा के लिए है । सैकण्ड को हमने छोटा मात्रक माना है । यदि हमने सैकण्ड को परिभाषित करने का दूसरा तरीका सोचा होता, तो सैकण्ड की अवधि कुछ और होती ।

यदि किसी दिन के सूर्योदय को और उसके बाद वाले सूर्योदय की अवधि को 24 घण्टे माना जाता है, तो उसका 24वां भाग 1 घण्टा गाना जाता है । 1 घण्टे को 3600 हिस्सों में विभक्त कर दें, तो उसका अस्तित्व क्या है ? दिन-रात 20,25,30 घण्टे कुछ भी हो सकते हैं ।

समय की गणना भारतीय पद्धति में एक घड़ी और एक घण्टा ढाई घड़ी के बराबर मानकर सात इकाइयों में प्रचलित है । ब्रह्मा का एक दिन मनुष्य के एक हजार दिन के बराबर होता है । इस तरह काल या समय अनन्त है, असीम है । आइंस्टीन के इसी सिद्धान्त ने परमाणु ऊर्जा को जन्म दिया । वे मानते थे कि पदार्थ का रूप परिवर्तित होता रहता है । वह नष्ट नहीं होता । यही ऊर्जा के बारे में भी है ।

4. अलबर्ट की अभिरुचियां:

आइंस्टीन की अभिरुचि वायलिन बजाने में बहुत थी । अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट ने जब उन्हें बम बनाने के लिए प्रेरित किया, तो वे हीरोशिमा और नागासाकी में उसके विध्वंसक रूप को देखकर दुखी हो गये ।

उनका रहन-सहन बहुत सीधा-सरल था । अपने घर की नौकरानी, माली, नाई आदि से भी आत्मीयता का अनुभव करते थे । वे ऋषियों की तरह एकाग्र, सक्रिय, ऊर्जावान और सृजनशील व्यक्ति थे ।

5. अलबर्ट की अन्य खोजें और उपलब्धियां:

बहुमुखी प्रतिभा के धनी आइंस्टीन ने मैट्रिक टेंसर, रीमान टेंसर, रिक्की आइटेन्टीस तथा गुरुत्वाष्कर्षण की भी खोज की । ब्रह्माण्डीय समस्याओं को समझने में सापेक्षता सिद्धान्त में उन्होंने जो दो परिकल्पनाएं प्रस्तुत कीं, उनमें पहली यह कि ब्रह्माण्ड बेलनाकार है और इसमें सभी आकाशगंगाएं तथा नीहारिकाएं समाई हैं ।

दूसरी यह कि ब्रह्माण्ड गोलाकार है । यह लगातार फैलता जा रहा है । आकाशगंगा हमसे तीव्र गति से दूर जा रही है । आइंस्टीन ने सबसे सुन्दर वस्तु को अनुभव का विषय बताते हुए इसे कला और विज्ञान का स्तोत्र बताया । उन्होंने परमात्मा को सूक्ष्म कहा ।

आइंस्टीन को अपने जीवन में बहुत-से अन्तर्विरोधों का सामना करना पड़ा । जर्मनी में उन्हें बार-बार अपमानित होना पड़ा । नाजियों ने बर्लिन स्थित उनके मकान को तहस-नहस कर दिया । उनकी सैर करने वाली नौका भी जज्ञ कर ली ।

वे जर्मनी में ही रहना चाहते थे । अशान्ति की अवस्था में वे असमय बूढ़े हो गये । पत्नी से तलाक के बाद वे अपने दूर की चचेरी बहिन एल्सा के साथ रहने लगे । आइंस्टीन विश्व शान्ति के लिए जीवन-भर व्याकुल रहे ।

6. उपसंहार:

आइंस्टीन का समय सापेक्षता का यह सिद्धान्त आज टेलीविजन, फोटोइलेक्ट्रिक सेल व अन्य आविष्कारों के लिए भी प्रेरणादायक सिद्ध हुआ । परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उनकी महान् खोजें अनूठी और प्रामाणिक धरोहर हैं ।

मानव-कल्याण के प्रति समर्पित आइंस्टीन को जब 1952 में इजराइल के राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव आया, तो उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया । किसी प्रकार की लालसा उनके मन में नहीं थी । ”युद्ध क्यों हो ?” ”विश्व के निर्माता” जैसे विषयों पर उन्होंने पुस्तकें भी लिखीं ।

जीवन के अन्त तक वैज्ञानिक प्रयोगों में रहने वाले  आइंस्टीन ने परमाणु निःशस्त्रीकरण के लिए ईमानदार कोशिश की । वे परमाणु ऊर्जा का विश्वशान्ति के लिए प्रयोग पर बल देते रहे । 18 अप्रैल, 1955 को इस महानू वैज्ञानिक ने प्रिस्टन के अस्पताल में इस संसार को अलविदा कहा ।

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